आंखों का अंधेरा भी नहीं रोक पाया सुप्रिया और अंबरी का शानदार सफर

By जय प्रकाश जय
October 30, 2019, Updated on : Wed Oct 30 2019 09:55:27 GMT+0000
आंखों का अंधेरा भी नहीं रोक पाया सुप्रिया और अंबरी का शानदार सफर
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वह चाहे मैनपुरी की निशा पाल हों, गाजीपुर की कुसमा देवी अथवा देवरिया की पूजा शाही, वुमन इंपॉवरमेंट की इस कड़ी में सीतापुर की ब्लाइंड सुप्रिया वर्मा और झारखंड की अंबरी प्रवीण का बेमिसाल सफ़रनामा कुछ अलग-सा है। इस समय अपना मुश्किल सफर लांघ चुकी दोनो देहरादून के अलग-अलग बैंकों में असिस्टेंट मैनेजर हैं।    

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फोटो सांकेतिक (साभार: Shutterstock)


घूंघट की ओट में लंबा वक़्त गुजार चुकीं महिलाएं भी अब चूल्हे चौके से बाहर निकलकर आए दिन ऊंची-ऊंची उड़ान के लिए अपने पंख खोलने लगी हैं। ग्रामीण महिलाओं हौसले अब तो देखते ही बन रहे हैं। अब वे बिना शिक्षा और पूंजी के भी रोजगार के क्षेत्र में भी उपलब्धियों की नई-नई इबारत लिख रही हैं। वे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर अपनी जिंदगी की दिशा बदल रही हैं। इन सबकी कामयाबी की दास्तान कमोबेश एक जैसी है, वह चाहे मैनपुरी की निशा पाल हों, गाजीपुर की कुसमा अथवा देवरिया की पूजा, लेकिन वुमन इंपॉवरमेंट की इस कड़ी में सीतापुर की सुप्रिया वर्मा और झारखंड की अंबरी प्रवीण का बेमिसाल सफ़रनामा कुछ अलग-सा है।    


पचीस वर्षीय सुप्रिया वर्मा और छब्बीस वर्षीय अंबरी प्रवीण, दोनों ही दृष्टि-बाधित (ब्लाइंड) हैं। देख नहीं सकती हैं। इसके बावजूद अपने हौसलों से अच्छे मुकाम हासिल कर लिए हैं। मंजिल तक पहुंचने का रास्ता कठिन था लेकिन इनके बुलंद इरादों के सामने सभी बाधाएं बौनी साबित हो गईं। सुप्रिया जब वर्ष 2007 में दसवीं कक्षा में थीं, आंखों के मर्ज ग्लूकोमा के कारण पढ़ाई रुक गई। उसके बाद वह पांच साल तक अपने घर में ही कैद सी रहीं। उसके बाद वह एनआईईवीपीडी में पढ़ाई के लिए देहरादून पहुंचीं। वर्ष 2017 में स्नातक करने के साथ ही उनकी उत्तराखंड ग्रामीण बैंक की जाखन शाखा में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर नौकरी लग गई।


अंबरी प्रवीण, चार भाई-बहन हैं, जिनमें से तीन ब्लाइंड हैं। बड़ी बेटी होने के कारण पिता को उनकी काफी चिंता रही। वर्ष 2006 में जब वह 10वीं में थीं, एक दिन अचानक उनकी भी आंखों की रोशनी चली गई। चार साल तक पढ़ाई रुकी रही। वह भी वर्ष 2013 में एनआईईवीपीडी पहुंच गईं। दिसंबर 2016 में वह भी बैंक ऑफ बड़ौदा, देहरादून में असिस्टेंट मैनेजर बन गईं। बाद में उन्हे पिछले साल नेशनल लाइफ अचीवमेंट अवार्ड भी मिला।





मैनपुरी (उ.प्र.) जिले के गांव नगला महानंद की निशा पाल ने स्वयं सहायता समूह बनाकर एक पुस्तक भंडार खोला। धीरे-धीरे आमदनी बढ़ी तो उन्होंने एक दर्जन से अधिक महिलाओं को इसमें जोड़ लिया। इसके बाद उनकी मेहनत को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में ब्लॉक रिसोर्स पर्सन चुना गया। अब वह गांवों में महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं।


सैदपुर बघौली (गाजीपुर) की कुसमा देवी ने जब स्वयं सहायता समूह की बारह महिलाओं के साथ कुछ पैसे जुटाकर बकरी पालन शुरू किया, मुनाफा होता गया, बकरियां बढ़ती गईं। तीन साल में बकरियों की संख्या 50 हो गई। उन्हे बकरी पालन से सालाना चार-पांच लाख रुपये की कमाई होने लगी। अब वे 'समूह' नाम से ही बैंक में खाते खुलवाकर उसमें जमा धनराशि से अलग-अलग तरह के कारोबार करने लगी हैं। जो कारोबार बढ़ जाता है, तीन माह बाद 15 हजार रुपये का रिवॉल्विंग फंड इस स्वयं सहायता समूह को दे दिया जाता है। छह माह बाद कम्यूनिटी इन्वेस्टमेंट फंड के रूप में 1.10 लाख की मदद भी मिल जाती है।

 




‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट’ से जुड़कर आइकॉन बन चुकीं देवरिया (उ.प्र.) के गांव सुरौली की इंटर तक पढ़ीं पूजा शाही अपनी अलग पहचान बना रही हैं। उनके हस्त निर्मित सजावटी सामान फेब इंडिया के शोरूम में धूम मचा चुके हैं। उनकी विदेशों तक सप्लाई हो रही है। पूजा को आईआईएम इंदौर से भी उनके सामानों की ब्रॉड्रिंग और मार्केटिंग का भरोसा मिल चुका है। पूजा धागे के इस्तेमाल से ज्वेलरी और घरेलू सजावटी सामान बनाती हैं। फेब इंडिया की ऑनलाइन मार्केटिंग के साथ ही देशभर में उसके 50 से अधिक स्टोर पर पूजा के हाथों बने ईयर रिंग, नेकलेस, कंगन, गार्डन झूला सहित अन्य सामान बिक रहे हैं।


यूएस की सासा हिल्स पूजा के सामानों के ऑर्डर दे चुकी हैं। इस समय पूजा के साथ 50 महिलाओं की टीम काम कर रही है। इसके साथ ही पूजा जिले के हर ब्लॉक में महिलाओं के अलग-अलग समूह गठित कर उन्हें अपने हुनर का प्रशिक्षण दे रही हैं।