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स्टार्टअप स्टोरी

पतियों के साथ मिलकर 7 लाख रुपए में शुरू किया था स्टार्टअप, टर्नओवर पहुंचा 1 करोड़ के पार

Sutrishna Ghosh
13th Jun 2019
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दफ्तर की टीम


हम आपको एक ऐसे को-वर्किंग स्पेस स्टार्टअप के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने महज़ तीन साल में मात्र 7 लाख रुपए के निवेश के साथ शुरुआत करने से लेकर 1 करोड़ रुपए के टर्नओवर के पार पहुंचने तक का सफ़र सफलतापूर्वक तय किया। हम बात कर रहे हैं पुणे के को-वर्किंग स्टार्टअप 'द दफ़्तर' की। हाल में इस स्टार्टअप के तीन सेंटर्स हैं और कंपनी जल्द ही और सेंटर्स खोलने के प्रयास में जुटी हुई है।


2016 में सुनंदा वर्मा भट्टा ने वंदिता पुरोहित के साथ मिलकर इस स्टार्टअप की शुरुआत की थी। सुंदना का कहना है, "जब एक जैसी सोच और प्रवृत्ति रखने वाले लोग साथ आकर काम करते हैं, तो उनके लिए कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता। हम चाहते थे कि इस सोच को एक निर्धारित फ़ॉर्मेट और प्लेटफ़ॉर्म दिया जाए और इसी उद्देश्य के साथ 'द दफ़्तर' की शुरुआत हुई।" सुनंदा और वंदिता के पति भी उनके साथ हाथ बंटा रहे हैं। इस को-वर्किंग स्पेस की शुरुआत एक छोटे से बंगले से हुई थी और अब यह 18,000 स्कवेयर फ़ीट की प्रॉपर्टी में तब्दील हो चुका है। सुनंदा मानती हैं कि दफ़्तर बहुत हद तक सैन फ़्रांसिस्को के को-वर्किंग कल्चर से प्रभावित है।


कंपनी की को-फ़ाउंडर वंदिता बताती हैं कि जब वह सैन फ़्रांसिस्कों में एक स्टार्टअप बूट कैंप के साथ काम कर रही थीं, उस दौरान उन्होंने देखा कि स्टार्टअप ज़्यादा से ज़्यादा समय को-वर्किंग स्पेस और कैफ़े में ही बिताते थे। वंदिता कहती हैं कि दफ़्तर के को-वर्किंग स्पेस परंपरागत आईटी ऑफ़िस के बोरिंग से क्यूबिकल से अलग हैं और इन्हें बहुत ही क्रिएटिव तरीक़े से तैयार किया गया है।





कंपनी की दोनों को-फ़ाउंडर अलग-अलग बैकग्राउंड से आती हैं। सुनंदा और उनके पति अमित ने मैनेजमेंट में पोस्ट-ग्रैजुएशन किया है। सुंनदा के पास बतौर ब्रैंड स्ट्रैटजिस्ट 10 सालों का लंबा अनुभव है, जबकि उनके पति ने सेल्स, ऑपरेशन्स और एचआर के सेक्शन्स में काम किया है। वहीं वंदिता एक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर हैं और उनके पति अभिषेक एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं।


वंदिता ने बताया कि बतौर ऑन्त्रप्रन्योर उनकी यात्रा दफ़्तर से पहले ही शुरू हो गई थी। उन्होंने बताया, "मैं 22 साल की थी, जब मेरे पति और मैंने अपना पहला वेंचर शुरू किया था। उन्होंने 2009 में मिंट ट्री नाम से एक सेल्स कन्सल्टिंग कंपनी शुरू की थी।"


वंदिता के पति अभिषेक बताते हैं कि कंपनी की कोर टीम चार लोगों की है और चारों अलग-अलग एजुकेशनल और प्रोफ़ेशनल बैकग्राउंड से ताल्लुक रखते हैं और यही उनकी ताक़त है। उनका मानना है कि सबकी अपनी-अपनी ख़ासियतें हैं, जो दफ़्तर को आगे बढ़ाने में बेहद मददगार हैं।




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'द दफ़्तर' के बारे में बात करते हुए फ़ाउंडर्स कहते हैं कि यह डिज़ाइन और एक्सपीरिएंस का शानदार मिश्रण मुहैया कराता है। इस को-वर्किंग स्पेस में न सिर्फ़ वर्कस्पेस मिलता है, बल्कि नियमित तौर पर नेटवर्किंग वर्कशॉप्स के साथ-साथ हेल्थ, स्पोर्ट्स, आर्ट और म्यूज़िक आदि से जुड़ीं विभिन्न गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं। सुनंदा का कहना है कि अपने सदस्यों के लिए उनके पास कई और वैल्यू-ऐडेड सर्विसेज़ भी हैं।


सुनंदा बड़ी ख़ुशी के साथ कहती हैं कि दफ़्तर को-वर्किंग स्पेस को देखने के का महसूस होता कि व्यक्तिगत विचारों और पसंद को किस तरह से काम के माहौल में जगह दी गई है।


फ़ाउंडर्स ने जानकारी दी कि मात्र 7 लाख रुपए के निवेश के साथ इस स्टार्टअप की शुरुआत हुई थी और यह पूरी तरह से बूटस्ट्रैप्ड कंपनी थी। तीन सालों बाद, कंपनी का टर्नओवर 1 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर चुका है। साथ ही, फ़ाउंडर्स बताते हैं कि कंपनी निवेशकों के साथ बात कर रही है और अपने ऑपरेशन्स को बढ़ाने के लिए फ़ंड्स जुटाने की कोशिश में लगी हुई है। उन्होंने बताया कि 2016 में दफ़्तर जब शुरू हुआ, तब को-वर्किंग स्पेस में 30 सीटों की जगह थी और तीन सालों में स्टार्टअप तीन सेंटर्स शुरू कर चुका है, जहां पर 550 सीटों की क्षमता है, जहां पर लगभग 1200 लोग काम कर रहे हैं।





वंदिता ने जानकारी देते हुए बताया, "हमारे को-वर्किंग स्पेस में फ़्रीलांसर्स, स्टार्टअप्स, रिमोट टीमें, फ़ंडेड स्टार्टअप्स, आर्किटेक्ट्स, मार्केटिंग और ब्रैंडिंग कन्सलटेंट और मेंटर्स आदि विभिन्न सेक्टरों से जुड़े लोग काम करते हैं।"


अपने को-वर्किंग स्पेस की ख़ासियत बताते हुए सुनंदा और अमित कहते हैं कि डिज़ाइन ही 'द दफ़्तर' की सबसे बड़ी ख़ासियत है। उन्होंने बताया कि को-वर्किंग स्पेस में इस बात का ध्यान रखा गया है कि हर सदस्य को आराम से सोचने और काम करने के लिए पर्याप्त स्पेस मिले। साथ ही, को-वर्किंग स्पेस में 'हैप्पी आवर्स', 'ब्रेनाथन' और 'ऑल हैंड्स' जैसे ख़ास क़िस्म के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं, ताकि इसकी जीवंतता बनी रहे।





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