फौलाद की बनीं विराली मोदी ने दिव्यांगता से कभी हार नहीं मानी, करना चाहती हैं इनके साथ एक्टिंग

By जय प्रकाश जय
December 28, 2019, Updated on : Sat Dec 28 2019 08:31:31 GMT+0000
फौलाद की बनीं विराली मोदी ने दिव्यांगता से कभी हार नहीं मानी, करना चाहती हैं इनके साथ एक्टिंग
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भारतीय-अमेरिकी विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता एवं लेखिका 29 वर्षीय विराली मोदी तो जैसे  फौलाद की बनी हैं। उन्होंने अपनी विकालंगता से कभी हार नहीं मानी है। तीन बार मृत घोषित हो चुकीं लकवाग्रस्त विराली के अब कूल्हे हरकत में आने लगे हैं। उनका सपना है, किसी दिन फिल्म स्टार इरफ़ान ख़ान के साथ ऐक्टिंग करें।

विराली

विराली मोदी


भारतीय-अमेरिकी विकलांगता अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका, अभिनेत्री  29 वर्षीय विराली मोदी, जो नवंबर 2018 में मुम्बई एयरपोर्ट पर जबरन व्हील चेयर से उतारे जाने और सितंबर 2019 में दिल्ली हवाई अड्डे पर अपने साथ बदसुलूकी के बाद इंटरनेशनल मीडिया की सुर्खियों में आ चुकी हैं, और जो उससे पहले मिस व्हीलचेयर इंडिया प्रतियोगिता की रनर-अप भी रही हैं, अपने जीवट और जिजीविषा दोनो में ही वह देश की एक अतिविलक्षण तथा प्रेरक युवतियों में शुमार हैं।


डॉक्टरों ने तीन बार घोषित किया मृत

अपनी सहज, आसान जिंदगी भी जिन्हे मुश्किल लगने लगती है, वे वर्ष 2006 में 14 साल की उम्र में व्हील चेयर की मोहताज बन गईं विराली मोदी के सफरनामे से सबक ले सकते हैं। बुखार और लकवे के बाद डॉक्टरों ने तीन बार तो उन्हे मृत तक घोषित कर दिया था। विराली बताती हैं कि ट्रेन यात्राओं में खासतौर पर उन्हें दिक्कतें आती थीं। जब उन्हे पुरुषों द्वारा एक सामान की तरह उठाया जाता तो बहुत ही बुरा लगता था। बस वहीं से उन्होंने दिव्यांगों के अधिकारों के लिए काम करना शुरू कर दिया।


उन्होंने प्रधानमंत्री और रेल मंत्री तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए 'चेंज डॉट ओआरजी' के जरिए याचिका अभियान शुरू किया। उसके बाद तो भारत के 2.10 लाख से ज्यादा लोग उनके साथ आ खड़े हुए। विराली मोदी के ही प्रयासों का नतीजा है कि केरल के चार रेलवे स्टेशनों पर दिव्यांगों के लिए विशेष सुविधाओं का इंतजाम किया गया है। 



अदम्य साहस की मिसाल

कौन बनेगा करोड़पति में हॉट सीट पर बैठने वाली उन्नाव की दिव्यांग नूपुर, कुशल भरतनाट्यम नृत्यांगना रह चुकीं शालिनी सरस्वती, हॉस्पिटल से छूटते ही एवरेस्ट फतह करने चल पड़ीं अरूणिमा सिन्हा जैसी विश्व की पहली महिला विकलांग पर्वतारोही तो लड़कियों के लिए प्रेरक रही ही हैं। विराली मोदी भी ऐसी शख्सियत हैं, जिन्हे कभी एक कॉन्सर्ट में खुशी से उछल पड़ी भीड़ ने हाथों में उठा लिया था, जब उन्होंने एक सौंदर्य प्रतियोगिता जीती और पैरों से असमर्थ होने के बावजूद वह शारीरिक रूप से असक्षम लोगों की यात्रा सरल बनाने के संकल्प के साथ अदम्य साहस की मिसाल बन गईं


अपने बीते 12 साल से व्हीलचेयर पर अपनी ज़िंदगी गुज़ारने वाली फौलादी विराली एक अन्य आत्मविश्वासी मिलेनिअल्स से ज़रा भी अलग नहीं लगतीं।


विराली बताती हैं कि उनके माता-पिता ने भी उनकी दिव्यांगता से कभी हार नहीं मानी। जब भी मदद की ज़रूरत पड़ी, वे हाजिर। वह लगातार विपरीत परिस्थितियों से लड़ती रहीं, क्योंकि वह ख़ुद को साबित करना चाहती थीं और कर भी दिखाया।


उन्होने पुणे में अंडरवॉटर फ़ेस्टिवल में हिस्सा लिया। रॉकस्टार स्टाइल में एक कॉन्सर्ट का हिस्सा बनीं। वह कहती है कि भारत में अभी भी लोग डिसेबिलिटी को कमतर समझते हैं, क्योंकि ये लोग सीखना नहीं चाहते। जागरूकता फ़ैलाने के लिए हम केवल एक ही काम कर सकते हैं, वह है एक कम्यूनिटी की तरह उभर कर आना।


भारत में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है, लेकिन हम उन्हें देख नहीं पाते। विराली का सपना है कि किसी दिन वह हॉलीवुड स्टार इरफ़ान ख़ान के साथ ऐक्टिंग करें। 



अमेरिका में जन्मी विराली वर्ष 2006 में पेन्सेलवेनिया से पहली बार भारत आई तो एक ऐसी बीमारी की गिरफ़्त में आ चुकी थीं, ह्वील चेयर की होकर रह गईं। एक दिन स्कूल में तेज सिरदर्द के साथ बुख़ार हुआ। अस्पताल में डॉक्टरों ने कई टेस्ट किए। लम्बर पंक्चर टेस्ट के दौरान वह तेईस दिनों के लिए कोमा में चली गईं। डॉक्टरों ने तीन बार मृत घोषित किया। 24वें दिन कोमा से बाहर आने पर उनके गर्दन के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त मिला।

नहीं मानी हार

वर्ष 2008 में स्टेम सेल से ट्रीटमेंट के लिए विराली को दोबारा भारत आना पड़ा, तब चेकअप में पता चला कि उन्हें न्यूरोलॉजिकल ट्रांस्वर्स मायलिटिस है, जिससे रीढ़ की हड्डी में सूजन के साथ ही नर्व फ़ाइबर्स नष्ट हो जाते हैं। चाहे जो भी हो जाता, विराली तो अलग ही मिट्टी की बनी थीं।


वर्ष 2014 के मिस व्हीलचेयर प्रतियोगिता में शामिल हो गईं। उसके बाद अगले साल नवी मुंबई के मैराथन के विज्ञापन में जगह हासिल करने के बाद उन्होंने डिसेबिलिटी राइट्स ऐक्टिविस्ट के रूप में अपनी आगे की जिंदगी को करियर बना लिया। कैम्पेन किए। डिसेबल्ड लोगों के लिए ट्रेनों में चढ़ने-उतरने की सुविधा की मांग उठाई। वह देश की ख्यात मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक बन गईं। अब उनके कूल्हे हरक़त में आने लगे हैं।


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